(गुस्से से) आयुष! ये तुम गलत कह रहे हो। आज़ादी सिर्फ छुट्टी का नाम नहीं है।
और मैं सबको एक प्रेरणा देती हूँ – ‘तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूंगा’ अब हमें बदलना है ‘तुम मुझे पढ़ाई दो, मैं तुम्हें तरक्की दूंगा।’
हाँ बेटा। गांधी जी, नेहरू जी, भगत सिंह, सुभाष बाबू – हज़ारों लोगों ने अपनी जान दे दी। गोलियाँ खाईं, जेल गए। तुम्हारे परदादा भी झंडा लहराते हुए पकड़े गए थे।
(रिया और आयुष दादी के पास बैठे हैं। दादी चरखा कात रही हैं।)
(सभी स्कूल की पोशाक में। तिरंगा फहर रहा है। एक बुज़ुर्ग खड़ा है, जो असली स्वतंत्रता सेनानी हैं।)
सच में? ऐसा भी था?
कोई बात नहीं बेटा। अब तुम समझ गए। असली आज़ादी सिर्फ झंडा फहराना नहीं है, बल्कि देश को आगे ले जाना है।
प्यारे बच्चों, मैं 1942 में ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ में जेल गया था। आज तुम्हें देखकर लगता है कि हमारा बलिदान सफल हुआ। लेकिन एक सवाल – क्या तुम सच में आज़ाद हो?
(हाथ उठाकर) जय हिंद!